नेशनल वैक्सीनेशन डे 2026: बच्चों को समय पर टीका लगाना क्यों है जरूरी

भारत में हर साल 16 मार्च को नेशनल वैक्सीनेशन डे मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य लोगों को टीकाकरण के महत्व के बारे में जागरूक करना और बच्चों को समय पर टीका लगवाने के लिए प्रेरित करना है। टीकाकरण को सार्वजनिक स्वास्थ्य की सबसे प्रभावी उपलब्धियों में गिना जाता है। इसके जरिए दुनिया भर में लाखों बच्चों की जान बचाई जा चुकी है और कई गंभीर बीमारियों पर काबू पाया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि सही समय पर सही टीका लगने से बच्चों को कई खतरनाक संक्रमणों से सुरक्षित रखा जा सकता है।

टीकाकरण का महत्व

स्वास्थ्य विशेषज्ञों और UNICEF के अनुसार, टीके तब सबसे ज्यादा प्रभावी होते हैं जब उन्हें बच्चे की उम्र के अनुसार तय समय पर लगाया जाए। कई बीमारियां खास उम्र के बच्चों को अधिक प्रभावित करती हैं। उदाहरण के तौर पर, पोलियो का खतरा पांच साल से कम उम्र के बच्चों में ज्यादा होता है। इसलिए इस बीमारी से बचाव के लिए शुरुआती उम्र में ही टीके दिए जाते हैं। अगर किसी कारण से टीकाकरण समय पर नहीं हो पाता या छूट जाता है, तो बच्चों में गंभीर संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। जन्म के समय दिए जाने वाले टीके बच्चे को जन्म के तुरंत बाद कुछ महत्वपूर्ण टीके दिए जाते हैं जो शुरुआती संक्रमणों से सुरक्षा प्रदान करते हैं।

बीसीजी (BCG) वैक्सीन: यह टीका तपेदिक यानी टीबी से बचाव के लिए लगाया जाता है। इसके बाद कभी-कभी इंजेक्शन वाली जगह पर दर्द, सूजन या हल्का बुखार जैसे सामान्य लक्षण दिखाई दे सकते हैं।

ओरल पोलियो वैक्सीन (OPV): यह पोलियो से बचाव के लिए मुंह से दी जाने वाली पहली खुराक होती है। इसे सुरक्षित माना जाता है और आमतौर पर इसके गंभीर दुष्प्रभाव नहीं होते।

हेपेटाइटिस बी वैक्सीन: यह टीका लीवर को प्रभावित करने वाले हेपेटाइटिस बी वायरस से सुरक्षा देता है। इंजेक्शन की जगह पर हल्की लालिमा या दर्द महसूस हो सकता है।

6 सप्ताह के बच्चे के टीके

बच्चे के छह सप्ताह पूरे होने पर कई महत्वपूर्ण टीके दिए जाते हैं। इनमें ओपीवी-1, पेंटावेलेंट-1, रोटावायरस वैक्सीन-1 और पीसीवी-1 शामिल होते हैं। ये टीके डिप्थीरिया, काली खांसी, टिटनेस, हेपेटाइटिस बी, हिब संक्रमण, गंभीर दस्त (रोटावायरस), निमोनिया, मेनिन्जाइटिस और पोलियो जैसी बीमारियों से सुरक्षा देते हैं। इनके बाद कभी-कभी हल्का बुखार, इंजेक्शन वाली जगह पर सूजन, चिड़चिड़ापन या भूख कम लगने जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं, जो सामान्यत: कुछ दिनों में ठीक हो जाते हैं।

10 सप्ताह और 14 सप्ताह के टीके

10 सप्ताह की उम्र में बच्चे को पेंटावेलेंट-2, ओपीवी-2 और रोटावायरस वैक्सीन-2 दी जाती है। इसके बाद 14 सप्ताह की उम्र में पेंटावेलेंट-3, ओपीवी-3, रोटावायरस वैक्सीन-3 और पीसीवी-2 की खुराक दी जाती है। ये टीके पहले दिए गए टीकों की सुरक्षा को मजबूत करते हैं और बच्चे को लंबे समय तक संक्रमणों से बचाने में मदद करते हैं।

9 से 12 महीने की उम्र के टीके

इस उम्र में बच्चों को खसरा-रूबेला (एमआर) वैक्सीन, जापानी इंसेफेलाइटिस (जेई) और पीसीवी बूस्टर दिया जाता है। एमआर वैक्सीन खसरा और रूबेला से बचाती है, जो बच्चों में बुखार, दाने और कई गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकते हैं। वहीं, जापानी इंसेफेलाइटिस एक मच्छर जनित बीमारी है जो दिमाग को प्रभावित कर सकती है। इसका टीका बच्चों को इस गंभीर संक्रमण से बचाने में मदद करता है।

16 से 24 महीने के बच्चों के टीके

इस आयु वर्ग में एमआर-2, जेई-2, डीपीटी बूस्टर-1 और ओपीवी बूस्टर दिए जाते हैं। ये बूस्टर डोज पहले लगाए गए टीकों की प्रतिरक्षा को मजबूत करती हैं और लंबे समय तक सुरक्षा सुनिश्चित करती हैं।

बड़े बच्चों के लिए भी जरूरी टीके

टीकाकरण केवल शिशु अवस्था तक सीमित नहीं होता। बड़े बच्चों के लिए भी कुछ बूस्टर खुराक जरूरी होती हैं 5-6 वर्ष: डीपीटी बूस्टर- 10 वर्ष और 16 वर्ष: टिटनेस और डिप्थीरिया (टीडी) की एक-एक खुराक ये टीके टिटनेस और डिप्थीरिया जैसी गंभीर बीमारियों से बचाव करते हैं, जो कई बार घाव या संक्रमण के जरिए हो सकती हैं।

समय पर टीकाकरण से सुरक्षित भविष्य

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों के लिए बनाए गए राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम का पालन करना बेहद जरूरी है। नेशनल वैक्सीनेशन डे केवल एक प्रतीकात्मक दिन नहीं है, बल्कि यह याद दिलाता है कि समय पर टीकाकरण बच्चों के स्वस्थ और सुरक्षित भविष्य की बुनियाद है। माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों का टीकाकरण कार्ड संभालकर रखें और डॉक्टर की सलाह के अनुसार हर टीका तय समय पर लगवाएं।

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