सिनेमा घरों में आने से कुछ घंटें पहले ही क्यों रूक गई ‘द केरल स्टोरी 2’की रिलीज

फिल्म ‘The Kerala Story 2 – Goes Beyond’ की रिलीज पर रोक को लेकर कानूनी विवाद गहराया गया है। Kerala High Court ने गुरुवार को अपने एकल न्यायाधीश (सिंगल जज) द्वारा फिल्म की रिलीज पर 15 दिनों के लिए लगाई गई रोक के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई की। सिंगल जज के आदेश के कुछ ही घंटों बाद फिल्म के निर्माताओं ने डिवीजन बेंच के समक्ष अपील दायर कर दी। इसके बाद देर शाम करीब 8 बजे दो न्यायाधीशों की पीठ ने मामले पर सुनवाई की।

बेंच ने उठाए प्रक्रिया संबंधी सवाल

न्यायमूर्ति सुष्रुत अरविंद धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति पी. वी. बालकृष्णन की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान यह सवाल उठाया कि फिल्म के प्रमाणन (सर्टिफिकेशन) को चुनौती देने वाली याचिकाएं जनहित याचिका (PIL) की प्रकृति की थीं। अदालत ने यह भी पूछा कि ऐसे मामले की सुनवाई सिंगल जज द्वारा किस आधार पर की गई। खंडपीठ ने संकेत दिया कि मामले में प्रक्रिया संबंधी पहलुओं की भी जांच जरूरी है। अदालत ने पक्षकारों की दलीलें सुनते हुए यह स्पष्ट किया कि वह सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद ही आगे का फैसला करेगी।

सिंगल जज ने 15 दिन के लिए रोकी थी रिलीज

बता दें कि इससे पहले हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने फिल्म की रिलीज पर 15 दिनों के लिए रोक लगा दी थी। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि फिल्म की सामग्री राज्य की छवि और सामाजिक सौहार्द पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है। उन्होंने फिल्म के सर्टिफिकेट को चुनौती देते हुए इसे रोकने की मांग की थी। अदालत ने प्रारंभिक सुनवाई के बाद अंतरिम आदेश देते हुए रिलीज पर अस्थायी रोक लगा दी थी, जिसके बाद निर्माता पक्ष ने तुरंत अपील का रास्ता अपनाया।

निर्माताओं का पक्ष: “फिल्म किसी समुदाय को बदनाम नहीं करती”

निर्माताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने अदालत में दलील दी कि फिल्म में ऐसा कोई तत्व नहीं है जो केरल राज्य या किसी धार्मिक समुदाय को अपमानित करता हो। उन्होंने कहा कि फिल्म एक सामाजिक बुराई को दर्शाती है और इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में देखा जाना चाहिए। निर्माताओं ने यह भी बताया कि Central Board of Film Certification (CBFC) ने फिल्म की समीक्षा के बाद प्रमाणन दिया है। उनके अनुसार, बोर्ड ने फिल्म की सामग्री में ऐसा कुछ नहीं पाया जो राज्य या किसी विशेष समुदाय को नुकसान पहुंचाने वाला हो।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम सामाजिक संवेदनशीलता

मामला अब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन का बनता जा रहा है। अदालत को यह तय करना है कि क्या फिल्म की विषयवस्तु सार्वजनिक व्यवस्था या सामाजिक सद्भाव को प्रभावित कर सकती है, या फिर इसे एक रचनात्मक अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि फिल्म को विधिवत सेंसर बोर्ड से प्रमाणन मिल चुका है, तो अदालतें आमतौर पर तभी हस्तक्षेप करती हैं जब सामग्री स्पष्ट रूप से कानून और व्यवस्था के लिए खतरा उत्पन्न करती हो।

आगे क्या?

डिवीजन बेंच की सुनवाई के बाद यह स्पष्ट होगा कि सिंगल जज का अंतरिम आदेश बरकरार रहेगा या उसमें कोई बदलाव किया जाएगा। यदि रोक हटाई जाती है तो फिल्म की रिलीज का रास्ता साफ हो सकता है, जबकि रोक जारी रहने पर मामला आगे उच्चतर न्यायिक स्तर तक भी जा सकता है। फिलहाल, फिल्म की रिलीज अनिश्चित बनी हुई है और उद्योग जगत की नजरें अदालत के अंतिम फैसले पर टिकी हैं।

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