भारत-अमेरिका ट्रेड डील के बाद ‘नेगेटिव’ से ‘स्टेबल’ हुआ भारतीय वस्त्र क्षेत्र

भारत और अमेरिका के बीच हालिया ट्रेड डील का असर अब भारतीय वस्त्र उद्योग पर साफ दिखने लगा है। अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर लगाए गए आयात शुल्क को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने के फैसले से वस्त्र निर्यातकों को बड़ी राहत मिली है। इसी के चलते भारतीय वस्त्र क्षेत्र का आउटलुक ‘नेगेटिव’ से सुधरकर अब ‘स्टेबल’ कर दिया गया है।

रेटिंग एजेंसी आईसीआरए की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 में वस्त्र निर्यात से होने वाली कमाई में 8 से 11 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी संभव है। हालांकि, मौजूदा वित्त वर्ष 2025-26 में निर्यात में 3 से 5 प्रतिशत तक की गिरावट का अनुमान जताया गया है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत-अमेरिका के बीच हुई व्यापारिक बातचीत ने सेक्टर का दबाव काफी हद तक कम किया है। भले ही वित्त वर्ष 2026 में कंपनियों का मुनाफा घटकर करीब 7.7 प्रतिशत तक आ सकता है, लेकिन इसके बाद वित्त वर्ष 2027 में इसमें फिर सुधार होने और मार्जिन लगभग 9.5 प्रतिशत तक पहुंचने की उम्मीद है।

आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में भारत का कुल वस्त्र निर्यात करीब 16 अरब डॉलर रहा, जिसमें से लगभग एक-तिहाई निर्यात अमेरिका को किया गया था। इससे साफ है कि अमेरिकी बाजार भारतीय वस्त्र उद्योग के लिए कितना अहम है।

आईसीआरए के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और ग्रुप हेड (कॉरपोरेट रेटिंग्स) जितिन मक्कड़ ने बताया कि पिछले वर्ष अमेरिका द्वारा टैरिफ बढ़ाए जाने से कपड़ा, हीरा और चमड़ा जैसे निर्यात-आधारित उद्योगों पर गहरा असर पड़ा था। उन्होंने कहा कि कई कपड़ा निर्यातकों को अपने अमेरिकी ग्राहकों को छूट देनी पड़ी, जिससे उनके मुनाफे में करीब 2 प्रतिशत तक की गिरावट आई।

रिपोर्ट में यह भी उम्मीद जताई गई है कि अमेरिकी टैरिफ में कटौती के साथ-साथ भारत-यूरोप मुक्त व्यापार समझौता और अन्य द्विपक्षीय व्यापार समझौते आने वाले समय में भारतीय मैन्युफैक्चरिंग निर्यात को मजबूती देंगे।

वैश्विक व्यापार में जारी अनिश्चितताओं के बीच टैरिफ में यह कमी भारतीय निर्यातकों के लिए राहत लेकर आई है। इससे उनकी लागत प्रतिस्पर्धा बेहतर होगी और खासतौर पर श्रम-प्रधान क्षेत्रों जैसे वस्त्र, कट और पॉलिश किए गए हीरे, समुद्री उत्पाद और फुटवियर उद्योग को इसका सीधा फायदा मिलेगा।

हालांकि, आईसीआरए का मानना है कि लंबे समय में भारतीय कंपनियां जोखिम कम करने के लिए अपने निर्यात बाजारों में विविधता लाने पर जोर देंगी, ताकि किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता से बचा जा सके।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *